सीधा सादा भोला भाला,
जाना जिसको स्कूल था
हर होटेल मे बर्तन मान्जे तितली गया भूल था ॥
हर हथेली खुरदरी, चेहरे की रौनक भी गायब
और आखो मे एक उदासी मूर्झाया वो फ़ूल् था |
झोपड़ी गरीब की उजाड़ी सो उजाड़ी अब बचपन ना उजाडो उनका बिनती सरकार से ,
बचपन जो उजड गया, देश भी उजड गया, उनको ना निकालों कभी उनके घरबार से,
उन पर ना निकालों रोष, निर्धन होना नहीं दोष, उनका क्या कसूर जरा यह भी बतलाईएँ,
खिलाए कानूनी कमल होता नहीं जिन पर अमल ,क्या किया है अब तक जरा यह भी जतलाईएँ
खा पी के पचाया देश ,नेता करे रोज एश, और बच्चे रो रहे है रोटी की दरकार से ,
पाँच साल गए भूल, छूट गया उनका स्कुल कभी तो नजर हमें आओं शर्मसार से |